Juma Bayan | Islamic Manners : Part 1 | জুমার বয়ান : ইসলামী শিষ্টাচার : ১ম পর্ব

বিবরণ : ইসলাম একটি পূর্ণাঙ্গ জীবন বিধান। এই বাক্যটি অনেকবার আমরা শুনেছি। কিন্তু এর অর্থ ও স্বাদ উপলব্ধি করতে পেরেছি খুব কমই। ইসলাম যেভাবে স্রষ্টার ইবাদতের নির্দেশ দেয়, তেমনি স্রষ্টার সৃষ্ট মানুষের সাথে মিশে পারিবারিক ও সামাজিক জীবন কীভাবে পরিচালনা করতে হবে, সেটাও ইসলাম শেখায়। এমনি ব্যক্তিগত জীবনে সারা দিনের প্রতিটি কাজ কীভাবে করতে হবে, ইসলাম তা শেখায়। ইসলামের শেখানো এসব শিষ্টাচার আমরা না জানার কারণে আজ মুসলিম হওয়ার পরও আমাদের অনেক আচরণ একজন অমুসলিমের মতো। অথচ ইসলামের মূল আকর্ষণই ছিল মুসলমানদের আচার-ব্যবহার।

এই বয়ান হতে আগামী কয়েকটি বয়ান ইনশা’আল্লাহ আমরা ইসলামের নির্দেশিত শিষ্টাচারগুলো নিয়ে আলোচনা করব। এই পর্বে যা যা থাকছে :

১. ঘরে কীভাবে ঢুকতে হয়।

২. কারো সাথে দেখা হলে অভিবাদন হিসেবে কী বলতে হয়।

৩. অন্যের বাসায় বা নিজ বাসায় অন্যের রুমে যাওয়ার আগে কী করতে হয়।

৪. কারো বাসায় গেলে দরজায় কীভাবে নক করতে হয়।

ইত্যাদি।

প্রাসঙ্গিক ভাবে এতে আরো উঠে এসেছে :

১. মোবাইলে কল করলে প্রথমে কী বলতে হয়।

২. মোবাইলে পর পর কয় বার কল করতে হয়।

বিষয়গুলো আমাদের জানা, শুনলে এমনটিই মনে হবে। কিন্তু আমরা কজন এসব মনে রাখি, সেটাই চিন্তার বিষয়। আশা করি এই সিরিজের বয়ানটি আমাদের আচার-ব্যবহারে পরিবর্তন আনতে সক্ষম হবে। আল্লাহ সহায় হোন।

নোট : এই সিরিজ বয়ানটি শায়খ আব্দুল ফাত্তাহ আবু গুদ্দাহ রহ. এর ‘من أدب الإسلام’ বই থেকে করা হচ্ছে।

তারিখ : ২৪/০৯/২০১০

স্থান : বায়তুল ফালাহ জামে মসজিদ, মালিবাগ, ঢাকা।

অডিও :

সতর্কতা : অনেক সতর্কতা অবলম্বন করা সত্ত্বেও এই বয়ানে দুই এক জায়গায় আছারকে নবীজীর স. হাদীস বলা হয়েছে, আবার হাদীসকে আছার বলা হয়েছে। অনিচ্ছাকৃত এসব ভুলের জন্য ক্ষমাপ্রার্থী। দোয়া চাই যেন ভবিষ্যতে আরো সতর্ক ভাবে বক্তব্য উপস্থাপন করতে পারি।

খতিবের নোট :

إنَّ للإسلام الحنيف آداباً وفضائل كثيرة، تَدخُلُ في كل شأن من شؤون الحياة، كما تشمل الكبير والصغير ، والرجل والمرأة ف” إِنَّ النساء شقائق الرجال ” ، كما قال النبي صلَّى الله عليه وسلَّم، فما يُطلَبُ من الرجل من أدب يُطلب من المرأة، فإنَّهما يكوِّنانِ المجتمعَ المسلم،وبهما ي
ُعْرَضُ الإِسلام و يُعْرَف.

وتلك الآداب قد دعا الإِسلام إليها، وحضَّ عليها،لتكامل الشخصية المؤمنة، وتحققِ الانسجام بين الناس، ولا ريب أن التحلِّي بتلك الآداب والفضائل مما يزيد في جمال سلوك المسلم، ويُعزِّز محاسنه، ويُحبِّبُ شخصيتَهُ، ويُدنيه من القلوب والنفوس.قليل الأدب، خير من كثير من العمل

عن سلمان قال قيل له قد علمكم نبيكم -صلى الله عليه وسلم- كل شىء حتى الخراءة. قال فقال أجل لقد نهانا أن نستقبل القبلة لغائط أو بول أو أن نستنجى باليمين أو أن نستنجى بأقل من ثلاثة أحجار أو أن نستنجى برجيع أو بعظم. (صحيح مسلم – 629))

إنكم قادمون على إخوانكم ، فأحسِنوا لباسَكم، وأصلحوا رِحالكم، حتى تكون كأنكم شامَةُ في الناس، فإنَّ الله لا يُحبُّ الفُحشَ ولا التَفَحُّشَ – الحديث

ا – أدب الدخول والخروج من بيتك بالتلطف وحسن التصرف
إذا دخلت دارك أو خرجت منها، فلا تدفع بالباب دفعاً عنيفاً ، أو تدعه ينغلق لذاته بشدة وعنف،فإن هذا منافٍ للطفِ الإسلام الذي تتشرف بالانتساب إليه، بل أغلقه بيدك إغلاقاً رفيقاً، ولعلك سمعت ما روته السيدة عائشة رضي الله عنها من قول رسول الله صلَّى الله عليه وسلَّم : ” إن الرِّفقَ لا يكون في شيءٍ إلاَّ زانه، ولا يُنزَعُ من شيء إلاَّ شانه ” . رواه مسلم.

2 – أدب التحية في الدخول والخروج على أهلك بتحية السلام عليكم
(السلام عليكم ورحمة الله وبركاته)، ولا تَعْدِل عن هذه التحية إلى غيرها من ( صباح الخير) أو (مرحبا) أو نحوِهما
قال أنس رضي الله عنه : قال لي رسول الله صلَّى الله عليه وسلَّم : ” يا بُنيَّ إذا دخلتَ على أهلك فسَلم، يكون بركةً عليك وعلى أهلك ” . رواه الترمذي. وقال قتادة أحدُ أعلام التابعين الفضلاء : إذا دخلت بيتك فسلِّم على أهلك فهم أحقُّ من سلَّمتَ عليهم.

3 – أدب الإشعار لأهل الدار عند الدخول عليهم
قال أبو عُبيدة عامر بن عبدالله بن مسعود رضي الله عنه: كان أبي – عبدالله بن مسعود- إذا دخل الدار استأنس-أي أشعر أهلها بما يؤنسهم- وتكلَّم ورفع صوته حتى يستأنسوا.
وقال الإمام أحمد رحمه الله تعالى: إذا دخل الرجل بيته، استحب له أن يتنحنح أو يحرك نعليه. قال عبد الله ابن الإمام أحمد: كان أبي إذا دخل-أي رجع- من المسجد الى البيت، يَضْرِبٌ برجله قبل أن يدخل الدار، حتى يسمع ضرب نعله لدخوله الى الدار، وربما تنحنح ، ليعلم من في الدار بدخوله.
ولهذا جاء في” الصحيحين” عن جابر أن رسول الله صلَّى الله عليه وسلم ” نهى أن يَطْرُق الرجل أهله ليلاً-أي أن ياتيهم ليلاً من سفر أو غيره على غفلة كأنه-، يتخونهم أو يلتمس عثراتهم”

4 – أدب استئذان الإنسان على أهله في داخل بيته
روى الإمام مالك في ” الموطأ”، عن عطاء بن يسار مرسلاً : ” أن رجلاً سأل رسول الله صلَّى الله عليه وسلم فقال : أستأذِنُ على أُمي؟ فقال : نعم ، فقال الرجل: إني معها في البيت، فقال رسول الله صلَّى الله عليه وسلم:استأذِنْ عليها، فقال الرجل : إني خادمها، فقال رسول الله صلَّى الله عليه وسلم : استأذِنْ عليها، أتحب أن تراها عريانة؟! قال:لا، قال: فاستأذِنْ عليها”
وجاء رجل إلى عبد الله بن مسعود رضي الله عنه، فقال له : أستأذن على أمي ؟ فقال له : ماعلى كل أحيانها تحب أن تراها . وقالت زينب زوجة عبد الله بن مسعود: كان عبد الله إذا جاء من حاجة فانتهى إلى الباب ، تنحنح كراهة أن يهجم منا على أمر يكرهه .
وقال التابعي ابن الصحابي موسى بن طلحة بن عبيد الله رضي الله عنهما: دخلت مع أبي على أمي ، فدخل واتبعته ، فالتفت فدفع في صدري حتى أقعدني على الأرض ! وقال : أتدخل بغيرإذن ؟! . وقال نافع مولى عبد الله بن عمر رضي الله عنهما: كان ابن عمر إذا بلغ بعض ولده الحلم -أي مبلغ الرجال – عزله -أي أفرده عن حجرته -فلم يدخل على ابن عمر إلا بإذن
وحكى ابن جريج عن عطاء بن أبي رباح ، قال : سألت ابن عباس رضي الله عنه : أستأذن على أختَيَّ ؟ قال : نعم ، قلت : إنهما في حجري -يعني في بيتي وعهدتي – وأنا أمونهما وأنفق عليهما؟ قال : أتحب أن تراهما عريانتين ؟! ثم قرأ وَإِذَا بَلَغَ الْأَطْفَالُ مِنكُمُ الْحُلُمَ فَلْيَسْتَأْذِنُوا كَمَا اسْتَأْذَنَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿النور: ٥٩﴾ ، قال ابن عباس : فالإذن – أي الاستئذان – واجب على الناس كلهم .

5- أدب طرق الباب على من تقصده وكيف يكون . .
دق الباب دقا رفيقا يعرفه وجود طارق بالباب ، ولا تدقه بعنف وشدة كدق الظلمة
جاءت امرأة إلى الإمام أحمد بن حنبل – رضي الله عنه ، لتسأله عن شىء من أمور الدين ، ودقت الباب دقا فيه بعض العنف ، فخرج وهو يقول : هذا الشرط – جمع شرطي – .
“إن الرفق لا يكون في شيء إلا زانه ، ولا ينزع من شيء إلا شانه “. وقال أيضا عليه الصلاة والسلام : “من يحرم الرفق يحرم الخيركله “. رواه مسلم .

قال رسول الله صلى الله عليه وسلم :”إذا استأذن أحدكم ثلاثاً فلم يؤذن له فلينصرف “. رواه البخاري ومسلم .
فقد “كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أتى باب قوم لم يستقبله من تلقاء وجهه ، ولكن من ركنه الأيمن أو الأيسر” . رواه أبو داود .

6- سنية إعلام الطارق بنفسه بذكر اسمه لمن يطرق عليهم
روى البخاري ومسلم ” . جابربن عبد الله رضي الله عنه قال : أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فدققت الباب ، فقالى : من هذا؟ فقلت :أنا،فقال النبي صلى الله عليه وسلم : أنا أنا؟! كأنه كرهها”.
روى البخاري ومسلم “عن أبي ذر رضى الله عنه قال: خرجت ليلة من الليالي، فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم يمشي وحده، فجعلت أمشي في ظل القمر، فالتفت فرآني، فقال: من هذا؟ فقلت : أبو ذر”.